शिव महापुराण एक प्राचीन हिंदू ग्रंथ है । यह अठारह प्रमुख पुराणों में से एक है और इसमें भगवान शिव के जीवन, उनके विभिन्न रूपों और उनकी दिव्य शक्तियों के बारे में विस्तृत जानकारी है। यह उन लोगों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं और शिव की दिव्य शक्ति को समझते हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!शिव महापुराण की उत्पत्ति
ऐसा माना जाता है कि इसे ऋषि वेद व्यास ने लिखा था, जो भगवान शिव के शिष्य थे। इस ग्रंथ की उत्पत्ति सदियों से रहस्य में डूबी हुई है, लेकिन माना जाता है कि यह हजारों साल पुराना है। शिव पुराण सभी पुराणों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुराणों में से एक है। भगवान शिव के विविध रूपों, अवतारों, ज्योतिर्लिंगों, भक्तों और भक्ति का वर्णन किया गया है। (Shivpuran)
शिवपुराण की संहिताए
| विद्येश्वर संहिता | विद्येश्वर संहिता में शिव भक्ति, ध्यान, साधना, पूजा-पाठ, व्रत, और तांत्रिक विधियों का वर्णन किया गया है। इसमें शिव और पार्वती के बीच होने वाले संवादों, शिवलिंग की महिमा, महामृत्युंजय मंत्र के फल, दिव्यत्व, और महाशिवरात्रि का महत्त्व वर्णित है। इसके अलावा, विद्येश्वर संहिता में शिव भक्त राजा मनु, नारद मुनि, ब्रह्मा, विष्णु, देवी पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, यमराज, गंगा, नंदी, चंद्रमा, और अन्य देवताओं के विषय में भी चर्चा होती है। |
| रुद्र संहिता | रुद्र संहिता में शिव की महिमा और विभिन्न अवतारों का वर्णन किया गया है। इसमें शिव-पार्वती के बीच हुए संवाद, मन्त्रों का उपयोग, पूजा-पाठ के विधान, व्रतों की महत्त्वपूर्णता, तांत्रिक साधनाओं का वर्णन, और शिव-भक्तों की कथाएं शामिल हैं। रुद्र संहिता में अन्य देवताओं और ऋषियों के संबंध में भी चर्चा होती है। यह पुराण शिव-भक्ति, साधना, और आध्यात्मिक ज्ञान को संचालित करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। रुद्र संहिता विशेष रूप से शिव भक्तों के बीच लोकप्रिय है और उन्हें शिव-पूजा और आराधना के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है |
| शतरुद्रसहिंता | शतरुद्र संहिता में शिवजी के अन्य चरित्रों जैसे- हनुमानजी का, श्वेत मुख और ऋषभदेवजी का वर्णन है, उन्हें शिवजी का अवतार कहा गया है, शिवजी की आठ मूर्तियां का भी उल्लेख हैं, इन आठ मूर्तियों से भूमि, जल, अग्नि, पवन, अन्तरिक्ष, क्षेत्रज, सूर्य और चन्द्र अधिष्ठित हैं, शतरूद्र संहिता में शिवजी के लोकप्रसिद्ध अर्द्धनारीश्वर रूप धारण करने की कथा बताई गयी है। |
| कोटिरुद्र संहिता | कोटिरुद्र संहिता में कोटि (यानी लाख) रुद्रों का उल्लेख होता है और इसे शिव की महिमा और उनके स्वरूप का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है। यह संहिता शिव के साथ जुड़े विभिन्न व्रतों, पूजा-पाठ, और अनुष्ठानों का वर्णन भी करती है। कोटिरुद्र संहिता में शिव महिमा के साथ-साथ शिव-पार्वती के बीच होने वाले संवाद, मन्त्रों का उपयोग, तांत्रिक विधियाँ, और शिवलिंग की महिमा का वर्णन भी होता है। इसके अलावा, इस संहिता में शिव-भक्तों की कथाएं, उनके उपास्य रूपों, महाशिवरात्रि के व्रत का महत्व है। कोटिरुद्र संहिता में शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों का वर्णन है। ये ज्योतिर्लिंग सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल में मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकालेश्वर, ओंकारेेश्वर में ओमकारेश्वर, हिमालय में केदारनाथ, डाकिनी में भीमेश्वर, काशी में विश्वनाथ, गौतमी तट पर त्र्यम्बकेश्वर, परल्यां में वैद्यनाथ, सेतुबंध में रामेश्वर, दारूक वन में नागेश्वर और शिवालय में घुश्मेश्वर हैं। |
| उमा संहिता | उमा संहिता’ में देवी पार्वती के अद्भुत चरित्र तथा उनसे संबंधित लीलाओं का उल्लेख किया गया है। |
| कैलाश संहिता | कैलास संहिता शिवपुराण का महत्वपूर्ण भाग है और इसे शिव-भक्ति और साधना की गहराईयों को समझने और अपनाने के लिए पठना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें शिवपुराण के अन्य अंगों की तुलना में भगवान शिव के विशेष स्वरूप, गुण, आदियों का वर्णन किया जाता है। कैलास संहिता शिवपुराण का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है और शिव-भक्तों के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसे पठने और अध्ययन करने से शिव-भक्त अपने आध्यात्मिक साधना में आगे बढ़ सकते हैं और भगवान शिव की कृपा को प्राप्त कर सकते हैं। |
| वायु-संहिता | वायु संहिता के दो भाग हैं। पूर्व और उत्तर। इन दोनों भागों में पाशुपत विज्ञान, मोक्ष के लिए शिव ज्ञान की प्रधानता, हवन, योग और शिव-ध्यान का महत्व समझाया गया है। शिव ही चराचर जगत् के एकमात्र देवता हैं। |

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बहुत अच्छा
ॐ नमः शिवाय
श्री शिवाय नमस्तुभ्यं
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जय श्री महाकाल।।
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