भगवान् श्रीराम जब भक्तिमती शबरीजी के आश्रम में आते हैं तो शबरीजी उनका स्वागत करती हैं, उनके श्रीचरणों को पखारती हैं, उन्हें आसन पर बैठाती हैं और उन्हें रसभरे कन्द-मूल-फल लाकर अर्पित करती हैं। प्रभु बार-बार उन फलों के स्वाद की सराहना करते हुए आनन्दपूर्वक उनका आस्वादन करते हैं। इसके पश्चात् भगवान राम शबरीजी के समक्ष नवधा भक्ति का स्वरूप प्रकट करते हुए कहते हैं कि
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!नवधा भक्ति (Navadha Bhakti)
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं । सावधान सुनु धरु मन माहीं ॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ॥
मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मनमें धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम ॥
दो०- गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान ।
चौथ भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ॥
तीसरी भक्ति है अभिमान रहित होकर गुरुके चरणकमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुणसमूहों का गान करे ।।
मंत्र जाप मम दृढ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥
छठ दम सील बिरति बहुकर्मा। निरत निरंतर सभोपदेश धर्मा ॥
मेरे (राम) मन्त्रका जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति हैं, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियोंका निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्योंसे वैराग्य और निरंतर संत पुरुषोंके धर्म (आचरण) में लगे रहना ॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा ॥
आठव जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ॥
सातवीं भक्ति है जगत्भरको समभावसे मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतोंको मुझ भी अधिक करके मानना आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाय उसीमें संतोष करना और भी पराये दोषोंको न देखना ॥
नवम सरल सब सन छलहीना । मम भरोस हिय हरष न दीना ॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥
नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदयमें मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्थामें हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी हो है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो ॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें ॥
जोगि बूंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई ॥
हे भामिनि! मुझे वही अत्यन्त प्रिय है। फिर तुझमें तो सभी प्रकारकी भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिये सुलभ हो गयी है ॥
प्राचीन शास्त्रों के अनुसार भक्ति के प्रकारों का वर्णन इस प्रकार से भी किया गया है –
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
- श्रवण : ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।
- कीर्तन : ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।
- स्मरण : निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना।
- पाद सेवन : ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्व समझना।
- अर्चन : मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।
- वंदन : भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।
- दास्य : ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।
- सख्य : ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना।
- आत्मनिवेदन : अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं।
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जय श्रीराम
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